Rewalsar Lake

Rewalsar Lake
Rewalsar: A tourist place, 25 Km from Mandi in Himachal

Saturday, 4 September, 2010

छलकते जाम...

               शुक्रवार का वो दिन याद आता है जब मेरी नज़र रास्ते में उन दो "सज्जन" लोगों पर पड़ी जो शराब पीये हुए कुछ बड़बड़ा रहे थे | उन्होंने इतनी पी रखी थी की कुछ पता ही नहीं चल पा रहा था कि वो क्या कहना चाह रहें हों, एक की तो पैंट भी गीली हो चुकी थी | सुबह-सुबह ही ये क्या नज़ारा देख लिया.... मैं उनको अनसुना करके चल पड़ा | तभी पीछे से आवाज़ आई "साब नमस्ते", मैंने बिना मुड़े हाथ उठा कर अभिवादन स्वीकार कर लिया | पर वो भी कहाँ मानने  वाला था, लड़खड़ा कर मेरे पीछे-पीछे चल दिया और मुझे रुकना ही पड़ा, उससे हाथ मिलाया तब जाकर कहीं पीछा छूटा |
               थोड़ा अपने आप को सहज महसूस किया ही था कि देखा सामने से एक छोटा सा नेपाली लड़का नंगें पांव चला आ रहा था | अपने लाल रंग की कमीज़ में कुछ छुपा कर ले जाने की कोशिश में वो तेज़- तेज़ चलता हुआ ज्यों ही मेरे पास से निकला तो देखा कि छोटू के पास देसी शराब की एक बोतल थी | पूछने पर उसने बताया की पापा ने मंगवाई है | कितना अजीब लगा कि एक छोटे से बच्चे से ऐसे काम करवाए जा रहें हैं | ऐसे माहौल में पला-बड़ा वो लड़का बड़ा होकर क्या इन चीज़ों से दूर रह पायेगा? हर्गिज़ नहीं|  अगर इतनी ही तलब है तो खुद ही लाकर पी लो ना, क्यों बच्चों को ऐसे कुसंस्कार दे रहे हो | 
              मेरे ऑफिस से लगभग 30 कदम पहले एक शराब का ठेका है | काफी भीड़ जमा होने के साथ-साथ शोर शराबा भी भरपूर था |  अधिकतर मेरी उम्र के नौजवान प्यालियाँ भर-भर के पी रहे थे | हैरान मत होइएगा, आज न कोई उत्सव है और न ही ये कोई बड़ा गाँव है | ये तो लगभग रोज़ का ही सिलसिला है |  सर्दियों में एक शराब के ठेके को छोड़कर यहाँ कोई भी दुकान खुली नहीं होती | यहाँ तक की खाना भी खाने को नहीं मिल पाता| परन्तु मार्च के अंत तक लाहौल घाटी में थोड़ी-थोड़ी हलचल शुरू हो जाती है | यहाँ भी एक छोटी सी दुकान खुल गयी थी जिसमें सामान लगभग न के बराबर था | लेकिन मदिरालय की शान तो देखिये, सुबह 6 बजे से शाम के 10 बजे तक रौनकें लगी रहती हैं, फिर भी कोटा है कि ख़त्म ही नहीं होता |
                     आखिर ऐसा भी क्या कि सोमरस के घूंट हलक से नीचे उतरे बिना नींद नहीं आती | "क्यों भई देवता भी तो मदिरा का सेवन करते हैं , फिर हमें ही क्यों लताड़ा जा रहा है" | ऐसे बेतुके तर्क देने वाले लोग अपनी ही बर्बादी का सबब बन रहे होतें हैं | शराब पी कर अनाप शनाप बकना शुरू कर देतें हैं | फिर तो माँ बहन का ख्याल भी नहीं रहता | नशे में चूर ऐसे लोग घर जाकर बीवी बच्चों को तो पीटते ही है, बल्कि आस-पास के लोगों का जीना भी दूभर कर देतें हैं | ये सारी बातें मुझे भीतर ही भीतर झझकोर रहीं थीं | रास्ते में मिले शराबी, नेपाली लड़का और मदिरालय कि बाहर जमा भीड़ ने मुझे व्यथित कर रखा था | मन में बैचेनी लिए जब ऑफिस पहुंचा तो एक बजुर्ग हाथ मैं कुछ कागज़ लिए मेरा इंतजार कर रहे थे | मेरे साथ वाली कुर्सी पर बैठते हुए बोले, "जनाब सुबह से कुछ भी नहीं खाया है और 6 किलो मीटर पैदल चल कर आ रहा हूँ |" उसके मुंह से शब्द निकलते ही  एक भभकी आई और ऑफिस की अगरबती की खुशबु  भी फीकी पड़ गयी, क्योंकि उसने भी रसास्वादन कर रखा था | मैंने उसे समझाया और दुत्कारा भी, परन्तु क्या मेरे अकेले के प्रयासों से ये समाज बदल पायेगा ? आप सब को मेरा साथ देना होगा | ताकि भारत देश एक बार फिर विश्व गुरु के पद पर आसीन हो सके |            

Monday, 23 August, 2010

एक अविस्मरनीय यात्रा

               सुबह के छ: बज रहे थे, मेरे साथी बैड पर बैठ कर प्राणायाम करते हुए जोर जोर से सांसें ले रहे थे मार्च का महीना और लाहौल  घाटी की ठण्ड, तापमान भी माइनस में ही था। मैं भी जल्दी से उठा और दैनिक कार्यो से निवृत हो कर हम दोनों तैयार हुए ही थे कि किसी ने दरवाजा खटखटाया, देखा तो सामने ऊन का एक मोटा सा कोट पहने हुए सिर  पर लाहौली टोपी लगाकर विश्राम गृह का  चौकीदार गर्म चाय लेकर आया था। हमने गर्म-गर्म चाय की चुस्कियां ली  और चौकीदार का धन्यवाद् करके निकल दिए।  बाहर टेक्सी वाला हमारा इंतजार ही कर रहा था सभी के मुंह से भाप निकल रही थी,  हम भगवान को याद करते हुए चल उदयपुर से तिंदी की ओर चल ड़े     

          दरसल हमें किसानों के खेतों  में जाकर उनको सेब की फसल की पैदावार के बारे में बताना था देवदार के घने जंगलो मे से गुजरते हुए हमारी गाड़ी 6-7 किलो मीटर चलने के बाद एकाएक रुक गयी ड्राईवर ने आगे जाने से मनाकर दिया क्योंकि सामने एक बड़ा  ग्लेशियर था मिलिटरी वालों की मशीने रास्ता बनाने मे लगी थी आख़िरकार हमें उतारने ही पड़ा मेरे साथ, मेरे उद्यान प्रसार अधिकारी, उदय सिंह, लगभग 56 साल के है, ने मुझे कुछ हौसला दिया और हम आगे बढ़ने लगे।  ग्लेशियर को कुछ  एसे से काटा गया था मानों कोई 50 फुट  ऊँची गुफा हो जिसका छत ऊपर से खुला था,  एक अदभूत दृश्य था जैसे ही हमने उसमे प्रवेश किया तो ऐसा लगा की हम किसी कोल्ड स्टोर मे आ गए हों । चलने मे काफी दिक्कत हो रही थी संभल कर चलना पड़ रहा था,  क्योंकि बर्फ बहुत सख्त थी और फिसलने की पूरी संभावना  थी
                                        

        एक दम ठंडी हवा ने हमारे शरीर को लगभग सुन्न सा कर दिया था  चूँकि रास्ता बंद था और गाड़ी के आगे जाने की कोई उम्मीद नहीं थी इसलिए हम पैदल ही निकल लिए तभी उदय सिंह ने जोर से आवाज़ मारी "साहब जल्दी-जल्दी चलो, धूप निकलने पर ऊपर पहाड़ी से पत्थर गिरना शुरू हो जाएंगे।" बातें करते-करते हमने तेज़ी से आगे बढना शुरू किया। शरीर में भी कुछ गर्मी आने लगी थी । रास्ता काफी खतरनाक था, पहाड़ी से पत्थर ऐसे लटक रहे थे मानों अभी गिरने वाले हों । कुछ दूरी पर अखरोट के पेड़ दिखाई दिए, उस जगह को "भीम बाग़" के नाम से जाना जाता है। कहा जाता है कि अज्ञातवास के समय पांडव कुछ दिनों के लिए यहाँ रुके थे। लगभग 5 किलो मीटर चलने के बाद हमें 2-3  मकान दिखाई दिए। थकान भी हो चुकी थी और हमारे पास खाने के लिए कुछ भी नहीं था। हमने थोड़ा विश्राम किया,  लाला से चाय और बिस्कुट लिए और जल्दी से दोबारा चलना शुरू कर दिया क्योंकि तिंदी पहुँचने के लिए हमें अभी 15 किलो मीटर का सफ़र तय करना था। चिनाब नदी के साथ हम दोनों बातें करते हुए जा रहे थे, उदय सिंह अपने जवानी के किस्से सुनाते और हम खूब हँसते, काफी रास्ता भी तय कर लिया था। मैं बीच -बीच में उदय सिंह से पूछता "अभी और कितना दूर है", "बस सर थोड़ा सा बचा है", शायद मुझे होंसला देने के लिए वो ऐसे बोलते थे। हम लगभग तिंदी से 4 किलो मीटर पीछे थे की सामने एक बड़ा भयंकर ग्लेशियर फिर नज़र आ गया। ऐसा लग रहा था मानों कुछ देर पहले ही आया हो। ग्लेशियर पर कोई रास्ता भी नहीं बना था, शायद उस पर चढ़ने वाले हम पहले यात्री थे । आगे तो बढना ही था इसलिए ग्लेशियर पर चढ़ तो गए जब लेकिन नीचे उतरने की बारी आई तो प्राण कंठ में आ गए। ढलान  बहुत अधिक थी, मेरे जूते भी फिसलन वाले थे। क्या करें कुछ समझ में नहीं आ रहा था, उदय सिंह तो नीचे उतर गए पर मैं ऊपर ही फंसा रह गया । अगर नीचे फिसल जाते तो सीधे चिनाब में विसर्जन हो जाता और शायद कुछ भी न मिलता। ज़िन्दगी का वो पल में कभी भी नहीं भुला पाऊँगा, मैंने सभी देवी देवताओं को याद कर लिया था । आख़िरकार संभल-संभल कर नीचे उतरा तो साँस में साँस आई ।
          अब हरे भरे जंगल नज़र आने लग गए थे । थोड़ा सा चलने पर एक 13 -14 साल  के लड़के से मुलाकात हो गयी । वो वहां भेड़ें चरा रहा था, और हमें बड़े हैरानी से देखने लगा । हमने उससे थोड़ी सी बातचीत की, तिंदी गाँव के बारे में पुछा और बातें करते करते हम लगभग एक घंटे में हम तिंदी पहुँच गए । हल्की हल्की बर्फ़बारी शुरू हो गयी । एक नेपाली ढाबे पे खाना खाया, सच मानिये दाल चावल के साथ खाना अत्यंत ही स्वादिष्ट लग रहा था । बिस्तर पर थोड़ा सा आराम करने बैठे ही थे कि पता ही नहीं चला कब आँख लग गयी । कुछ ही समय में हम गहरी नींद में सो चुके थे